
मुगल शासक अपनी क्रूरता और बर्बरता के लिए कुख्यात हैं. मंदिर तोड़ने से लेकर जबरन इस्लाम कबूल करवाने के किस्से आम हैं. हालांकि एक मुगल शासक ऐसा भी हुआ जिसने कट्टरता की जगह सांप्रदायिक सौहार्द को तरजीह दी. पिता हुमायूं के असमय निधन के बाद 1556 में महज 13 साल की उम्र में गद्दी पर बैठने वाले अकबर की कोई औपचारिक शिक्षा-दीक्षा नहीं हुई. लेखिका अनु कुमार अपनी पुस्तक ‘किंग्स एंड क्वींस ऑफ इंडिया’ (Kings and Queens of India) में लिखती हैं कि अकबर का ज्यादातर बचपन अपने पिता हुमायूं के साथ दर-दर भटकते बीता.
13 की उम्र में मिली सत्ता
12 साल के थे तभी घुड़सवारी से लेकर ऊंट और हाथी की सवारी करना सीख गए थे. तलवार से लेकर तमाम हथियार भी चला लेते थे. हुमायूं ने अपने वफादार बैरम खान को अकबर का गार्जियन नियुक्त किया था, जो बहुत क्रूर था. साल 1556 में जब मुगलों ने पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमू को बंधक बनाया तो बैरम खान ने 13 साल के अकबर को उसका गला काटने को कहा.
इतिहासकार जॉन एफ. रिचर्ड्स लिखते हैं कि जब अकबर ने इससे इनकार कर दिया और हिचकिचाने लगे तो बैरम खान ने खुद हेमू का गला रेत दिया. बाद में बैरम खान की यही कट्टरता अकबर की नाराजगी की वजह बनी.
